Golconda Fort

Golconda Fort, (17° 23’ N ; 78° 23’ 30” E) one of the famous and the biggest forts in the Deccan Plateau, built on a 400-ft. high hill is situated 11 km west of Hyderabad city. The Golconda Fort derives its name from a Telugu word ‘Golla Konda’ which means Shepherd’s Hill. The fort played a vital role in the political history of Deccan during the medieval period. Golconda with its extensive and elevated fortifications is a milestone in South Indian Medieval Architecture.

Originally the fort was under the Kakatiya rule (which is testified by its architectural and sculptural remains) as part of their western defences. Then for a brief spell it was under the control of Musunuri Nayaks, there after they ceded it to the Bahamanis in 1363 C.E. After their downfall in 1518 C.E., it became the capital of the Qutub Shahi Dynasty (1518-1687 C.E.). During this period the fort was further strengthened. It was annexed to the Mughal Empire by Aurangazeb in 1687 C.E. after defeating Abul Hasan Tana Shah, the last ruler of the Qutub Shahi dynasty and Asaf Jah was appointed as the Subedar of the Deccan province. Asaf Jah declared independence in 1713 C.E. and bore the title of Nizam-ul-Mulk. There after the Nizams held sway over Hyderabad till 1948 C.E.

In its ruins also it is a masterpiece and stands testimony of the past glory of the Qutab Shahi dynasty and its creative achievements. The site was brought under the protection of Archaeological Survey of India in 1951.

Within its stone fortifications having a diameter of 2 Km, the Golconda Fort envelopes a medieval Islamic settlement. The historic structures ranges from military and defensive structures, mortuary baths, silos, mosques, gardens, residential quarters, pavilions and royal courts, that catered to life in a medieval fortified town in India. The fort has three lines of massive defence walls one within the other and the walls rise to a height of over 12 m and was provided by a moat around the outer fortification wall of about 7 Km. It has 8 imposing gateways and is buttressed with 87 bastions rising to a height of 15 to 18 m. Each of these bastions was surmounted by cannons of varying calibre rendering the fort impregnable among the forts of the medieval Deccan. An extension of the outer wall was made to enclose a small area on the northeast of the town in 1724 C.E., which is now known as Naya Quila. The well-planned township of Golconda located within the fort was one of the splendid cities famous in the medieval world for its extensive trade in gems and diamonds as attested to by foreign travellers like Marco Polo. The fort has a striking appearance and its higher area as covered with the reservoirs and audience chambers; while at the foot of the citadel are nestled the dwellings of the queens and princesses and homesteads of their retainers.

It has an ingeniously evolved water supply system. The water raised by Persian wheels was stored in huge tanks at different levels. Water thus collected was effectively distributed to various mahals, other rooms, roof gardens and fountains in the citadel through stone aqueducts and a network of earthen pipes by sheer force of gravity, which stands testimony about the water management skills of the authors during the medieval age.

The important structures are the Habshi Kamans (Abyssinian Arches) located aside the present main entrance. The structures inside the citadel or Bala Hisar are the clapping portico, Silah Khana (a three storied armoury building), Mortuary Bath, Nagina Bagh, Guard lines, Akkana-Madanna offices, Taramati Mosque Royal palaces, Camel stable, Ramdas Jail, Darbar hall, ruins of Ambar Khana, Baradari on the summit, an inner cordon wall, and a Masjid raised by Ibrahim Qutub Shah (1550-1580 C.E.). The east gateway is the only entrance to the Citadel and it is one of the biggest gates in the entire fort.

गोलकोण्डा किला

गोलकोण्डा किला दक्खिनी पठार के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं विशाल दुर्गों में से एक है। यह हैदराबाद नगर के पश्चिम में लगभग ११ किलोमीटर की दूरी पर समुद्र तल से लगभग ४०० फीट ऊँची एक पहाड़ी पर स्थित है। इस किले का नाम तेलुगु शब्द "गोल्ला कोण्डा" से व्युत्पन्न माना जाता है, जिसका अर्थ है "चरवाहों की पहाड़ी"।

प्रारंभ में यह दुर्ग काकतीय साम्राज्य का अंग था। सन् १३६३ ईस्वी में यह बहमनी सल्तनत के अधीन आ गया। बहमनी साम्राज्य के पतन के पश्चात् सन् १५१८ ईस्वी में गोलकोण्डा किला क़ुतुबशाही वंश (१५१८-१६८७ ई.) की राजधानी बना। इस काल में किले का व्यापक विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण किया गया।

सन् १६८७ ईस्वी में मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने क़ुतुबशाही वंश के अंतिम शासक अबुल हसन तानाशाह को पराजित कर गोलकोण्डा को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया तथा आसफ़जाह को दक्खिन का सूबेदार नियुक्त किया। आगे चलकर सन् १७१३ ईस्वी में आसफ़जाह ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर निज़ाम-उल-मुल्क की उपाधि धारण की। इसके पश्चात् सन् १९४८ ईस्वी तक निज़ामों ने हैदराबाद पर शासन किया।

इस किले की सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ थी। किले को एक-के-भीतर-एक निर्मित लगभग १२ मीटर ऊँची तीन विशाल प्राचीरें सुरक्षित करती हैं। इसके अतिरिक्त, लगभग ७ किलोमीटर लंबी बाहरी किलाबंदी दीवार के साथ एक गहरी रक्षात्मक खाई निर्मित की गई थी, जो शत्रु आक्रमण से सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन थी।

गोलकोण्डा किले में कुल आठ प्रवेश द्वार तथा ५ से १८ मीटर ऊँचे ८७ प्रहरी-बुर्ज निर्मित किए गए थे। प्रत्येक बुर्ज पर मारक तोपें स्थापित थीं, जिनके कारण किला लगभग अभेद्य दुर्ग के रूप में विकसित हुआ। बाहरी प्राचीर को आगे बढ़ाकर नगर के उत्तर-पूर्वी भाग में एक अतिरिक्त क्षेत्र को भी घेरा गया था, जिसे वर्तमान में नया किला कहा जाता है।

किले के भीतर स्थित सुनियोजित नगर अपने समय में हीरे-जवाहरात के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। मार्को पोलो सहित अनेक विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रा-वृत्तांतों में इस नगर का उल्लेख किया है। किले के ऊँचे भागों में शस्त्रागार, बारूदखाने, मस्जिदें, अनाज-कोठार तथा जलाशय स्थित हैं, जबकि निचले भागों में रानियों, शहजादों एवं उनके सेवकों के आवास निर्मित थे।

किले के भीतर एक अत्यंत विकसित एवं वैज्ञानिक जल-आपूर्ति प्रणाली विद्यमान थी। रहटों द्वारा जल को टंकियों में एकत्र कर, पाइपों एवं नालियों के जाल के माध्यम से गुरुत्वाकर्षण बल की सहायता से महलों, कक्षों, छतों के बागों तथा फव्वारों तक पहुँचाया जाता था।

दुर्ग परिसर में तिमंज़िला असलहख़ाना, नगीना बाग, सैनिकों के आवास, अक्कन्ना-मादन्ना कार्यालय, रामदास कारागार, दरबार हाल तथा अन्न भंडार के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। पहाड़ी की चोटी पर बारादरी, भीतरी प्रतिरक्षा दीवार तथा इब्राहीम क़ुतुबशाह (१५५०-१५८० ई.) द्वारा निर्मित मस्जिद स्थित है। किले में प्रमुख प्रवेश पूर्वी द्वार से होता है।

गोलकोण्डा किला अपनी विशिष्ट ध्वनि-आधारित संदेश प्रणाली के लिए भी प्रसिद्ध है। प्रवेश द्वार के मध्य भाग में ताली बजाने पर उत्पन्न ध्वनि एक विशेष कोण पर स्थित सामने की संरचना में स्पष्ट रूप से सुनाई देती है। वहाँ से यह ध्वनि आगे पहाड़ी के शिखर तक पहुँच जाती थी, जिससे संभवतः छतों पर तैनात पहरेदारों को अमीर-उमराव के आगमन की सूचना दी जाती थी। यह प्रणाली विशेष रूप से शाही मुलाक़ातों के दौरान संदेश संप्रेषण के लिए उपयोग में लाई जाती थी।

तारामती मस्जिद

तारामती मस्जिद महल-समूह के भीतर स्थित एक छोटी, सुंदर एवं प्रसिद्ध मस्जिद है। इसकी स्थापत्य योजना में दो ओर लगभग ३.५ मीटर चौड़ी छोटी कमानें तथा मध्य में लगभग ४.२ मीटर चौड़ी एक बड़ी कमान निर्मित है। हिंदू स्थापत्य शैली से प्रभावित छज्जों से अलंकृत मुण्डेर तथा मध्य में सात और दोनों ओर पाँच-पाँच प्रवेश-मार्ग इस इमारत की सौंदर्यात्मक विशेषताओं को उभारते हैं।

मस्जिद के दोनों ओर स्थित मीनारों से छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। इसके अन्तर्मुखी गुम्बदों की ज्यामितीय कारीगरी, बारह कमानों पर टिका लगभग छह फुट चौड़ा मंच, तथा संतुलित संरचनात्मक योजना इसे विशिष्ट बनाती है।

क़ुतुबशाही बादशाहों द्वारा महलों एवं अन्य इमारतों का निर्माण विभिन्न कालों में कराया गया था, जिनमें से अनेक संरचनाएँ पाँच से छह मंज़िल तक ऊँची थीं। वर्तमान में उपलब्ध ये भग्नावशेष-जिनमें शाही महल, जनाना कक्ष, दीवान-ए-आम (श्रोतागण हॉल), फव्वारे एवं जलाशय सम्मिलित हैं जो क़ुतुबशाही स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। अलंकृत दीवारें, चमकदार टाइलें, पलस्तर में उकेरे गए आभूषण तथा पॉलिश की गई शिलाप्रतिष्ठाएँ इस स्थापत्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं।

हब्शी कमान

बालाहिसार के मुख्य प्रवेश द्वार के उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित दो ऊँची संरचनाओं को हब्शी कमान कहा जाता है। इन कमानों से संबद्ध इमारतों में क़ुतुबशाही बादशाह की सुरक्षा हेतु नियुक्त हब्शी पहरेदारों के आवासीय कक्ष स्थित थे। ये संरचनाएँ किले की सुरक्षा व्यवस्था एवं क़ुतुबशाही कालीन सैन्य संगठन का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है।

अस्लाहखाना (तीन मंज़िला)

यह सजावटी तीन मंज़िला इमारत जिसकी प्रत्येक मंज़िल पर सात-सात चौड़ी कमानें निर्मित है| किले की सर्वाधिक प्रभावशाली संरचनाओं में से एक है। इसकी निर्माण-शैली के आधार पर इसे १६वीं शताब्दी के उत्तरार्ध का माना जाता है। इमारत के भीतर बड़ी संख्या में संचित आग्नेयास्त्रों के अवशेष इसके शस्त्रागार के रूप में उपयोग किए जाने की पुष्टि करते हैं।

ऊँटखाना

यह विशाल आयताकार भवन उत्तर तथा पूर्व दिशा में स्थित कमानीदार प्रवेश-द्वारों से खुलता है। इसका भीतरी भाग दो चापाधार पंक्तियों द्वारा दो खंडों में विभक्त है। पत्थर की चौड़ी सिल्लियों से पाटी गई सपाट छत दीवारों एवं चापाधार संरचनाओं पर अधिष्ठित है। यह भवन क़ुतुबशाही बादशाहों के ऊँटों के अस्तबल के रूप में प्रयुक्त होता था। अपने उत्कर्ष काल में इसकी छत पर उद्यान (बगीचा) भी विकसित किया गया था, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

ख़िलवत

ख़िलवत किले के भीतर स्थित बादशाह का निजी कक्ष है। आकार में यह अपेक्षाकृत छोटा, किंतु अत्यंत अलंकृत स्थापत्य इकाई है। इसे ऊँची चारदीवारी से घेरकर मुख्य परिसर से पृथक रखा गया था, जिससे एकान्तता एवं सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

शव-स्नानागार

फ़ारसी-तुर्की हमाम स्थापत्य शैली में निर्मित यह स्नानागार शाही ख़ानदान के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के शवों के रस्मी स्नान हेतु प्रयुक्त किया जाता था। इसमें गर्म एवं ठंडे जल के लिए पृथक-पृथक हौज़ निर्मित हैं। निरंतर जल-आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भूमिगत स्तर पर चूने के पलस्तर से आच्छादित मिट्टी के पाइपों की सुव्यवस्थित प्रणाली विकसित की गई थी।

नगीना बाग

मुख्य प्रवेश द्वार के दाईं ओर स्थित यह आनंद उद्यान नगीना बाग के नाम से जाना जाता है। इसके नाम के दो संभावित अर्थ माने जाते हैं-'बाग़ों का सिरमौर' अथवा वह स्थान जहाँ ईद एवं अन्य त्योहारों के अवसर पर हरम की महिलाओं के लिए आभूषण उपलब्ध कराए जाते थे।

यह उद्यान मुग़ल शैली के बाग़ों के अनुरूप वर्गाकार विन्यास में निर्मित है, जिसमें फ़र्शी पगडंडियों द्वारा विभक्त संरचना दिखाई देती है। ये पगडंडियाँ संभवतः उद्यान के केन्द्र में स्थित फव्वारों तक जाती थीं, जो इसके सौंदर्य एवं भव्यता को और अधिक बढ़ाती थीं।

रामदास कारागार

यह सुदृढ़ आयताकार भवन मूलतः एक भण्डारगृह था। क़ुतुबशाही वंश के अंतिम शासक अबुल हसन तानाशाह (१६७२-१६८७ ई.) के शासनकाल में इसे कारागार में परिवर्तित कर दिया गया। कहां जाता है, शाही ख़ज़ाने के ख़ज़ांची तथा भगवान राम के महान भक्त भद्राचल रामदास को शाही धन के कथित दुरुपयोग के आरोप में यहीं बंदी बनाकर रखा गया था।

बारादरी (दरबार महल)

यह अनोखी दो-मंज़िला इमारत पहाड़ी की प्राकृतिक बनावट के अनुरूप निर्मित है तथा दुर्ग का सर्वोच्च बिंदु है। इसकी प्रमुख विशेषताओं में खुली चौकोर छतें, श्रोतागण हॉल (दीवान-ए-आम एवं दीवान-ए-ख़ास) तथा ऊपरी छत पर स्थित पाँच सीढ़ियों वाला पत्थर का तख़्त सम्मिलित हैं।

एक वक्राकार, ढलानयुक्त सीढ़ीदार दीवार के माध्यम से शीतल वायु का संचार होता है, जिससे ग्रीष्म ऋतु में भी वातावरण सुहावना बना रहता है। बारादरी तक जाने वाले मार्ग में दो सूखे कुएँ स्थित हैं, जिन्हें संभवतः सेना के जल-भंडार के रूप में उपयोग किया जाता था।

ऊपरी भाग में अंबारखाने (शाही ख़ज़ाना) के अवशेष विद्यमान हैं। यहाँ स्थित एक फ़ारसी शिलालेख से ज्ञात होता है कि इसका निर्माण अब्दुल्ला क़ुतुबशाह द्वारा सन् १६४२ ई. में कराया गया था। इसके आगे इब्राहीम क़ुतुबशाह द्वारा निर्मित मस्जिद स्थित है। बारादरी के समक्ष देवी महाकाली का एक छोटा जागृत मंदिर भी है, जहाँ आषाढ़ मास (जून-जुलाई) में लोक पर्व 'बोंनालू' प्राचीन काल से आयोजित किया जाता रहा है।

नया किला

मुख्य किले के उत्तर-पूर्वी पहाड़ी क्षेत्र में स्थित नया किला का निर्माण अब्दुल्ला क़ुतुबशाह द्वारा कराया गया था। सन् १६५६ ई. में मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने अपने प्रथम आक्रमण के दौरान इसे आधार-स्थल के रूप में उपयोग किया। मुगल-संधि के पश्चात् अब्दुल्ला क़ुतुबशाह ने मूल किले की चारदीवारी को आगे बढ़ाकर नए किले के चारों ओर सुदृढ़ बुर्जों का निर्माण कराया।

नए किले के परिसर में दो ऐतिहासिक मस्जिदें स्थित हैं, जिनका निर्माण इब्राहीम क़ुतुबशाह (१५५०-१६११ ई.) के प्रारम्भिक शासनकाल में हुआ था। ये मस्जिदें क़ुतुबशाही स्थापत्य कला के आरम्भिक चरणों की महत्वपूर्ण झलक प्रस्तुत करती हैं। इनमें से पहली मस्जिद वज़ीर मुस्तफ़ा ख़ान के नाम पर है, जिसके आँगन में तीन क़ब्रें स्थित हैं। इनमें से दो क़ब्रों के शिलालेखों से उन्हें मुस्तफ़ा ख़ान के पुत्रों की समाधियाँ माना जाता है।

दूसरी मस्जिद मुल्ला ख़याली द्वारा सन् १५६९ ई. में निर्मित कराई गई थी। मुल्ला ख़याली राजकवि एवं प्रसिद्ध ख़त्तात थे। मस्जिद के उत्तर-पूर्व में स्थित एक विशाल हथियान (अफ्रीकी मूल का) वृक्ष, जिसकी तने की परिधि लगभग २५ मीटर है जो आज भी विद्यमान है और इसे लगभग ४५० वर्ष प्राचीन माना जाता है।

प्रवेश शुल्क

भारतीय नागरिक, सार्क देशों एवं बिम्सटेक देशों के नागरिकों हेतु

  • नकद भुगतान : ₹ २५/-
  • नकद-रहित (डिजिटल) भुगतान : ₹ २०/-

विदेशी नागरिकों हेतु

  • नकद भुगतान : ₹ ३००/-
  • नकद-रहित (डिजिटल) भुगतान : ₹ २५०/-

१५ वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रवेश निःशुल्क है।

भ्रमण समय

प्रातः ८:३० बजे से सायं ५:३० बजे तक

अधिक जानकारी हेतु संपर्क

वरिष्ठ संरक्षण सहायक का कार्यालय
गोलकोण्डा किला, हैदराबाद - ५००००८
दूरभाष : ०४०-२३५१३९८४
ई-मेल : scaglk@gmail.com

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण
हैदराबाद मण्डल, हैदराबाद